दिल्ली के वातानुकूलित कमरों से लेकर मध्य प्रदेश के भिंड तक की चौपालों पर आज एक ही सवाल गूंज रहा है— क्या राहुल गांधी शुरू से ही सही थे? जिस नेता को कभी उनके राजनीतिक विरोधी 'वोट चोरी', 'चुनावी हेराफेरी' और संस्थाओं के दुरुपयोग के दावों पर सिरे से खारिज कर देते थे, आज उसी नेता की चेतावनियां देश के लोकतंत्र के लिए एक कड़वा और खौफनाक सच बनकर सामने आ रही हैं। चुनाव आयोग (Election Commission) के भीतर मचे हालिया घमासान और मतदाता सूची (Voter List) से करोड़ों नामों के रातों-रात गायब होने के जिन दावों ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया है, उसने अचानक राहुल गांधी के पुराने बयानों को एक नई और धारदार प्रासंगिकता दे दी है।
मजाक उड़ाने वाले आज खुद कठघरे में! सालों तक जब भी राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और सत्ताधारी दल की 'अजेय चुनावी मशीनरी' पर सवाल उठाए, तो भाजपा के प्रवक्ताओं ने इसे 'हार की हताशा' और 'विपक्ष का रोना' बताकर खूब मजाक उड़ाया। लेकिन अब सियासत की हवा का रुख बदल चुका है। जिस तरह से एक सुनियोजित तरीके से देश भर में विपक्ष के मजबूत गढ़ों से मतदाताओं के नाम काटे जाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं, उसने यह साबित कर दिया है कि राहुल गांधी हवा में तीर नहीं चला रहे थे। वे उस 'अदृश्य डकैती' की ओर इशारा कर रहे थे, जो सीधे चुनाव के दिन नहीं, बल्कि महीनों पहले मतदाता सूची के पन्नों से अंजाम दी जा रही थी।
संस्थाओं पर कब्जे की भविष्यवाणी सच साबित हुई? सियासी गलियारों में आग की तरह फैल रही रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश भर में करीब 13 करोड़ वोटों को साजिश के तहत 'गायब' करने का जो मुद्दा अब तूल पकड़ रहा है, वह उसी खतरे की घंटी है जिसे राहुल गांधी बार-बार बजा रहे थे। उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक, भारत जोड़ो यात्रा से लेकर चुनावी रैलियों तक यह लगातार कहा था कि 'हमारी लड़ाई अब सिर्फ एक राजनीतिक दल से नहीं है, बल्कि देश की उन संस्थाओं से है जिन्हें हाइजैक कर लिया गया है।' आज मुख्य चुनाव आयुक्त पर लग रहे पक्षपात के खुले आरोपों ने राहुल गांधी की उस बात पर मुहर लगा दी है कि 'जब मैदान का रेफरी ही विपक्षी टीम का कप्तान बन जाए, तो निष्पक्ष खेल की उम्मीद कैसे की जा सकती है?'
क्या अब पूरी तरह बेनकाब हो गया है सत्ता का 'प्लान बी'? विपक्ष का सीधा दावा है कि जब सत्ता पक्ष को यह एहसास हुआ कि सिर्फ प्रचार और चेहरों के दम पर चुनाव नहीं जीते जा सकते, तो असली 'प्लान बी' लागू किया गया— जो वोट आपके खिलाफ पड़ने वाले हैं, उन्हें जड़ से ही खत्म कर दो! राहुल गांधी ने बार-बार देश को चेताया था कि सत्ता की चाबी जनता के हाथों से छीनकर कुछ चुनिंदा नौकरशाहों के हाथों में सौंपी जा रही है। आज जब चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्था के अंदर से ही असहमति (objections) और मनमानी के स्वर बाहर आ रहे हैं, तो यह साफ हो गया है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली कर दी गई है।
लोकतंत्र के लिए आर-पार की जंग आज की तारीख में राहुल गांधी सिर्फ एक विपक्षी नेता नहीं, बल्कि उस 'पॉलिटिकल व्हिसलब्लोअर' की तरह नजर आ रहे हैं जिसने इस चुनावी चक्रव्यूह को बहुत पहले भांप लिया था। उनके समर्थक आज सीना तान कर कह रहे हैं कि 'हमारा नेता सही था।' अब सवाल यह नहीं है कि सत्ता पक्ष इस पर क्या सफाई देता है; सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस 'संस्थागत वोट चोरी' के कैंसर से देश के लोकतंत्र को कैसे बचाया जाएगा? अगर नागरिक का वोट ही सुरक्षित नहीं है, तो फिर यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र केवल कागजों पर सिमट कर रह जाएगा।


0 टिप्पणियाँ